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Showing posts from May, 2021

नियंत्रण एवं समन्वयन Part-2/Class 10/ Lesson 7

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    पादपों में समन्वय  (Co- ordination in Plant)  सभी जीवो पौधों और जंतुओं में जैविक क्रियाओं का समन्वयन एवं नियंत्रण पाया जाता है। जंतुओं में तो इसके लिए संवेदी अंग व तंत्रिका तंत्र होता है। परंतु पौधों में ना तो तंत्रिका तंत्र होता है और ना ही विशेष संवेदी अंग (जैसे- आंख, कान, नाक आदि) होते हैं, किंतु फिर भी पौधों में जीवन के प्रति अनुक्रिया देखी जाती है। पौधे उद्दीपन के प्रति संवेदनशील होते हैं और अनुक्रिया करते हैं आप छुईमुई तथा सूरजमुखी के पौधों में अनुक्रिया को आसानी से देख सकते हैं। पादपों में नियंत्रण एवं समन्वयन केवल हार्मोन्स के द्वारा होता है। जिन्हें पादप हार्मोन कहते हैं।   पादप हार्मोन-   ये जटिल कार्बनिक पदार्थ है। जो पेड़ पौधों में निश्चित स्थानों पर बनते हैं तथा वहां से संवहन ऊतकों द्वारा पौधे के विभिन्न भागों में स्थानांतरित होकर उनकी वृद्धि, उपापचयी तथा समन्वय क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।  हार्मोन शब्द का अर्थ है 'उत्तेजित करने वाला पदार्थ' स्टर्लिंग में सन् 1906 में हार्मोन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किया थ...

नियंत्रण एवं समन्वयन Part-1/Class 10/ Lesson 7

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  नियंत्रण एवं समन्वयन (Control and Co-ordination)  सभी जीवो में चेतना होती है। इसी गुण के कारण जीवधारी अपने बाह्य तथा आंतरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को जान पाते हैं और उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं। वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को उद्दीपन कहते हैं और उद्दीपन के प्रति दिखाई गई प्रतिक्रिया को अनुक्रिया कहते हैं। जीवो में बाह्य व भीतरी वातावरण के बीच संतुलन या तालमेल बनाए रखने की क्षमता को नियंत्रण या होमियोस्टैसिस तथा सामान्य स्थिति बनाए रखने की प्रतिक्रियाओं को समन्वयन कहते हैं। मानव में समन्वयन  मानव में नियंत्रण तथा समन्वयन तंत्रिका तंत्र तथा पेशी ऊतक द्वारा किया जाता है-  तंत्रिका तंत्र -  तंत्रिका तंत्र केवल जंतुओं में ही होता है। पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं पाया जाता है। तंत्रिका तंत्र का कार्य हमारे शरीर में होने वाली विभिन्न क्रियाओं में समन्वय बनाए रखने का है। इसका निर्माण तंत्रिका कोशिकाओं से होता है। तंत्रिका कोशिकाएं, उद्दीपनों से सूचनाओं को ग्राही अंगों के द्वारा ग्रहण करके तीव्र गति से शरीर के अन्य भागों तक पहुंचाती...

Life process Part-4/Class 10/ Lesson 6

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     Class 10 Biology Chapter-6/ part -4 जैव प्रक्रम-                         उत्सर्जन (Excretion) शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरुप हानिकारक तथा विषैले अपशिष्ट पदार्थों का निर्माण होता है। इन पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित करने की क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।  यह पदार्थ इतने हानिकारक हो सकते हैं कि जीव की मृत्यु भी हो सकती है। अतः जिन पदार्थों का उत्सर्जन होता है। उन पदार्थों को उत्सर्जी पदार्थ (अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, कार्बन डाइऑक्साइड आदि) कहते हैं तथा जिन अंगों द्वारा इनका उत्सर्जन होता है उन अंगों को उत्सर्जी अंग कहते हैं। मनुष्य में ठोस अपशिष्ट पदार्थ गुदा द्वारा शरीर के बाहर निकाले जाते हैं नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ (अमोनिया यूरिया आदि) जल में घुलित अवस्था में उत्सर्जन तंत्र की सहायता से शरीर के बाहर निष्कासित किए जाते हैं गैसीय अपशिष्ट पदार्थ श्वसन क्रिया द्वारा शरीर से बाहर निकाले जाते हैं।  उत्सर्जन के प्रकार जंतुओं के उत्सर्जी पदार्थ विभिन्न प्रकार के होत...

Life process Part-3/Class 10/ Lesson 6

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Class 10 Biology Chapter-6/ part -3 जैव प्रक्रम-                  परिवहन      (Transportation)  सजीवों के अंदर लगातार चलने वाली जैविक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर के विभिन्न अंगों, ऊतकों एवं कोशिकाओं को बाह्य वातावरण से ऑक्सीजन, पोषक पदार्थ, भोजन तथा पानी की आपूर्ति निरंतर बनी रहे। पता है शरीर के एक भाग से शरीर के दूसरे भाग में इन पदार्थों को पहुंचाना ही परिवहन कहलाता है किंतु जटिल संरचना के जीवों में पूर्ण विकसित परिवहन तंत्र होता है। परिवहन तंत्र के प्रकार  तरल अथवा बहने वाले दृव के आधार पर परिवहन तंत्र निम्न तीन प्रकार के होते हैं-  1- जल परिवहन तंत्र- कुछ जलीय जीवों जैसे स्पंज सीलेन्टृॆट्स (हाइड्रा) व सितारा मछलियों में जल शरीर के अंदर आवश्यक पदार्थों का संवहन करता है।  2-रुधिर परिवहन तंत्र - इस परिवहन तंत्र में रुधिर संवहन माध्यम होता है। यह सभी कशेरुकी जंतुओं, केंचुऔं व कीटों में पाया जाता है।  3- लसिका परिवहन तंत्र- लसिका वास्तव में छना हुआ रुधिर होता है। ...