Life process Part-4/Class 10/ Lesson 6
Class 10 Biology
Chapter-6/ part -4
जैव प्रक्रम-
उत्सर्जन (Excretion)
शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरुप हानिकारक तथा विषैले अपशिष्ट पदार्थों का निर्माण होता है। इन पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित करने की क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
यह पदार्थ इतने हानिकारक हो सकते हैं कि जीव की मृत्यु भी हो सकती है। अतः जिन पदार्थों का उत्सर्जन होता है। उन पदार्थों को उत्सर्जी पदार्थ (अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, कार्बन डाइऑक्साइड आदि) कहते हैं तथा जिन अंगों द्वारा इनका उत्सर्जन होता है उन अंगों को उत्सर्जी अंग कहते हैं। मनुष्य में ठोस अपशिष्ट पदार्थ गुदा द्वारा शरीर के बाहर निकाले जाते हैं नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ (अमोनिया यूरिया आदि) जल में घुलित अवस्था में उत्सर्जन तंत्र की सहायता से शरीर के बाहर निष्कासित किए जाते हैं गैसीय अपशिष्ट पदार्थ श्वसन क्रिया द्वारा शरीर से बाहर निकाले जाते हैं।
उत्सर्जन के प्रकार
जंतुओं के उत्सर्जी पदार्थ विभिन्न प्रकार के होते हैं जिनके आधार पर उत्सर्जन निम्न तीन प्रकार का होता है
1- अमोनिया उत्सर्जन- इसमें नाइट्रोजन का उत्सर्जन मुख्यत: अमोनिया के रूप में होता है। ऐसे जंतु जो अमोनिया उत्सर्जित करते हैं, उन्हें अमोनोटेलिक कहते हैं।
2- यूरिया उत्सर्जन- इसमें नाइट्रोजन का उत्सर्जन मुख्यतया यूरिया के रूप में होता है। यूरिया उत्सर्जित करने वाले जंतुओं को यूरियोटेलिक कहते हैं। जैसे स्तनधारी, मनुष्य, मेंढक आदि।
3- यूरिक अम्ल उत्सर्जन- इसमें नाइट्रोजन का उत्सर्जन यूरिक अम्ल के रूप में होता है यूरिक अम्ल उत्सर्जित करने वाले जंतुओं को यूरिकोटेलिक कहते हैं उदाहरण पक्षी, सरीसृप, बहुत से कीट आदि।
मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System)
मनुष्य में मुख्य उत्सर्जी अंग एक जोड़ी वृक्क होते हैं इनसे संबंधित अन्य सहायक उत्सर्जी अंग निम्नलिखित हैं
मूत्रवाहिनीयां
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
वृक्क (Kidney)
मनुष्य में 1 जोड़ी वृक्क पाए जाते हैंं, जो उदर गुहा में डायाफ्राम के नीचे कशेरुक दंड के दोनों तरफ अधर सतह पर पतली पेरीटोनियम झिल्ली द्वारा लगे रहते हैं।
वृक्क की संरचना -
वृक्क, सेम के बीज के आकार के कत्थई, भूरे लाल रंग के अंग हैं। यह लगभग 10 सेंटीमीटर लंबा 5.6 सेंटीमीटर चौड़ा एवं 2.5 सेंटीमीटर मोटा होता है पुरुष में वृक्क का भार 130 से 160 ग्राम तथा स्त्रियों में 110 से 150 ग्राम तक होता है। वृक्क के ऊपर अधिवृक्क ग्रंथि पाई जाती है। मनुष्य में दायां वृक्क बाएं वृक्क की अपेक्षा कुछ पीछे तथा नीचे की ओर स्थित होता हैै। वृक्क का भीतरी किनारा धंसा हुआ या अवतल तथा बाहरी किनारा उभरा हुआ या उत्तल होता हैं। वृक्क के भीतरी धसे हुए भाग को हाइलम कहते हैं। यहां से मूत्रनलिका निकलती है जो उदर के निचले भाग में स्थित थैलीनुमा मूत्राशय में खुलती है। प्रत्येक वृक्क, वृक्क धमनी द्वारा रुधिर प्राप्त करता है और वृक्क शिरा वृक्क से रुधिर एकत्रित करके पश्च महाशिरा में पहुंचाती है।
वृक्क की आंतरिक संरचना
वृक्क की अनुुुुलम्ब काट में देखने पर वृक्क के भीतरी धंसे हुए किनारे के मध्य में कीप के समान एक खोखली संरचना होती है, जो पेल्विस कहलाती है। यही भाग प्रायः सकरा होकर मूत्रनलिका का निर्माण करता है। वृक्क का शेष भाग ठोस तथा दो भागों बाहरी भाग कॉर्टेक्स तथा भीतरी भाग मेेड्यूूला में बटा होता है। प्रत्येक वृक्क असंख्य सूक्ष्म वृक्क नलिकाएंं या नेफ्रॉन का बना होता है।
वृक्क नलिका या नेफ्रॉन की संरचना
प्रत्येक वृक्क में लगभग 8 से 12 लाख महीन, लंबी तथा कुंडलित नलिकाएं या नेफ्रॉन होती है नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई है। यह संयोजी उत्तक रुधिर वाहिनीयां लसिका वाहिनीयां तथा पेशी तंतुओं में दबी हुई एवं फंसी हुई पाई जाती हैै।
प्रत्येक वृक्क नलिका या नेफ्रॉन को निम्नलिखित चार भागों में बांटा जा सकता है।
बोमेन संपुट, समीपस्थ कुंडलिक नलिका, हेनले लूप, दूरस्थ कुंडलिक नलिका
- बोमेन संपुट - प्रत्येक नेफ्रॉन में दोहरी कलायुक्त, प्यालेनुमा बोमन संपुट होता है। बोमेन संपुट का बाहरी स्तर चपटी शल्की उपकला का बना होता है। डोमेन सम्पुट के अंदर रुधिर का प्रवाह एक मोटी अभिवाही धमनिका तथा बाहर की ओर रुधिर का प्रवाह एक पतली अपवाही धमनिका द्वारा होता है। दोनों धमनिकाएं बोमेन संपुट में कोशिकाओं का एक गुच्छा बनाती है जो कोशिका गुच्छ कहलाता है।
- समीपस्थ कुंडलिक नलिका- बोमेन संपुट के बाद अगला भाग समीपस्थ कुंडलिक नलिका कहलाता है। इस समीपस्थ कुंडलिक नलिका की कोशिकाओं पर रसाकुंर पाए जाते हैं, जो मिलकर ब्रुश बॉर्डर का निर्माण करती हैं, इससे इस भाग की अवशोषण क्षमता बढ़ जाती है।
- हेनले लूप- इसके बाद समीपस्थ कुंडलिक नलिका आगे जाकर एक 'U'आकार की नली हेनले लूप में खुलती है। इसके नीचे की तरफ जाने वाली भुजा अवरोही नलिक तथा ऊपर की तरफ जाने वाली भुजा आरोही नलिका कहलाती है हेनले लूप वृक्क के मेड्यूला में स्थित होती है। इसकी मूत्र के सांद्रण नियमन में मुख्य भूमिका होती हैै।
- दूरस्थ कुंडलिक नलिका - हेनले लूप का आरोही भाग एक छोटी ,मोटी दुरस्थ कुंडलित नलिका से जुड़ा रहता है। यह भाग कॉर्टेक्स में पाया जाता है तथा घनाकार उपकला का बना होता है। दूरस्थ कुंडलिक नलिका वास्तव में वृक्क नलिका का अंतिम भाग है। जो एक मोटी मूत्र संग्राही नलिका में जाकर खुलती है।
वृक्क में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि
वृक्क के नेफ्रॉन में मूत्र निर्माण निम्नलिखित तीन प्रक्रियाओं द्वारा होता है
- परानिस्यन्दन- कोशिका गुच्छ की रुधिर कोशिकाओं में जितना रुधिर अभिवाही धमनिका से आता है, उतना ही समान मात्रा में अपवाही धमनिका से नहीं निकल पाता है। इसके फलस्वरूप कोशिका गुच्छ की रुधिर केशिकाओं में रुधिर का दाब बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए दाब के कारण रुधिर का तरल भाग छनकर बोमेन संपुट में आ जाता है। यह छना तरल नेफ्रिक निस्यंद कहलाता है इसमें यूरिया, यूरिक अम्ल तथा अनेक लवण होते हैं।
- 2 .वणात्मक या चयनात्मक पुनराशोषण- वृक्क में परानिस्यन्दन के दौरान प्रतिदिन लगभग 150 से 180 लीटर नेफ्रिक निस्यंद होता है, जिसमें से मात्र 1.5 लीटर मूत्र के रूप में उत्सर्जित होता है तथा शेष भाग का पुनः अवशोषण हेनले लूप में हो जाता है। विसरण तथा सक्रिय पुनरावशोषण द्वारा क्रमशः जल तथा अन्य घटकों का अवशोषण हो जाता है। जल के पुनरावशोषण का नियंत्रण ADH (Anti Di Uretic Harmon) द्वारा होता हैै। इस क्रिया में महत्वपूर्ण तत्व जैसे- ग्लूकोस, विटामिन ,अमीनो अम्ल आदि पुुुुुन: रुधिर में पहुंचा दिए जाते हैं ।
- 3. वाहिकीय स्त्रावण- वृक्क नलिकाओं के समीपस्थ तथा दूरस्थ भाग की केशिकाएं परिनलिका जाल की रुधिर केशिकाओं से हानिकारक उत्सर्जी पदार्थ ,जो छन्ने से रह गए थेे, सक्रिय विसरण द्वारा वृक्क नलिकाओंं की संग्रही नलिका में मुक्त कर दिए जाते हैं। इस क्रिया को वाहिकीय स्त्रावण कहते हैं। शेष छना हुआ तरल मूत्र कहलाता है, जो समूह नलिकाओं से होता हुआ मूत्राशय में एकत्र होता रहता है।
वृक्कों के कार्य (Function of Kidney)
वृक्कों के कार्य निम्नलिखित है-
* यह उपापचयी नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों जैसे- यूरिया को द्रव अवस्था में शरीर से बाहर निकालने के लिए मुख्य उत्सर्जी अंग है।
* यह रुधिर में उपस्थित अन्य विषैले तथा अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित करने में भी सहायक है।
* वणात्मक पुनराशोषण एवं वाहिकीय स्त्रावण द्वारा यह pH को नियंत्रित रखते हैं, जिससे रुधिर की वांछित अम्लीलीयता या क्षारीयता बनी रहती हैै।
* वृृक्क अतिरिक्त पोषक पदार्थों का ऊतक द्रव में निष्कासित करते हैं, जिससे इनका संतुलन बना रहता है।
* परानिस्यंदन के बाद वृक्क पुनः जल, ग्लूकोज तथा अन्य लवणों का अवशोषण करते हैं। जिससे रुधिर का परासरणीय दाब नियंत्रित रहता है।
* भ्रूण अवस्था में वृक्क RBCs का निर्माण भी करते हैं।
कृत्रिम वृक्क या रुधिर अपोहन (Artificial Kidney or Haemodialysis)
उत्तरजीविता के लिए वृक्क जैव अंग है। कई कारक जैसे- संक्रमण आघात या वृक्क में सीमित रुधिर प्रवाह वृक्क की क्रियाशीलता को कम कर देते हैं। इससे शरीर में विषैले अपशिष्ट पदार्थ संचित हो जाते हैं। जिससे मृत्यु भी हो सकती है। रुधिर में एकत्रित व्यर्थ उत्सर्जी पदार्थों को कृत्रिम वृक्क व्यक्ति सहायता से पृथक करने को अपोहन कहते हैंं। अपोहन मशीन को कृत्रिम वृक्क कहते हैं। कृृत्रिम वृृक्क में रुधिर को सैलोफेन की झिल्ली से बंधित नलिकाओं द्वारा प्रवाहित करते हैं। नलिकाओं के बाहर अपोहनी तरल प्रवाहित होता है यह झिल्ली यूरिया, यूूूरिक, क्रिएटिनिन आदि के लिए पारगम्य होती हैै। किन्तु प्लाज़मा प्रोटीन तथा रुधिर कणिकाओं के लिए अपारगम्य होती है।
वृक्क प्रतिस्थापन या प्रत्यारोपण( Kidney Transplant)-
उचित दाता से लिए गए वृक्क का प्रत्यारोपण किया जा सकता है वृक्क के प्रत्यारोपण से पहले ऊतकों का मिलान किया जाता है वृक्क के प्रत्यारोपण के पश्चात रोगी को आजीवन प्रतिरक्षी तंत्र संंदमक औषधियां लेनी होती हैं।
पादपों में उत्सर्जन
जंतुओं की भांति पौधे भी अपशिष्ट उत्पादों का उत्सर्जन करते हैं। पौधे अपशिष्ट पदार्थों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए अपशिष्ट पदार्थ केशिका रिक्तका में संचित किए जा सकते हैं। या गोंद व रेजिन के रूप में तथा गिरती पतियों द्वारा दूर किया जा सकता है। ये अपने आसपास की मृदा में उत्सर्जित कर देते हैं।
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)
पौधों के वायवीय भागों द्धारा जल की अतिरिक्त मात्रा को वायुमंडल में वाष्पित करने की क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। पौधों द्वारा मृदा से अवशोषित जल का अधिकांश भाग पत्तियों तथा तनो द्वारा वाष्प के रूप में निकल जाता है तथा इस अवशोषित जल का मात्र 5% ही पादपों द्वारा उनकी विकास एवं उपापचय क्रिया में प्रयोग होता है। वाष्पोत्सर्जन एक भौतिक क्रिया होने के साथ किसी सीमा तक एक जैविक क्रिया भी है जो जीवद्रव के द्वारा नियंत्रित रहती हैै। वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक बुराई कहां गया है वाष्पोत्सर्जन दिन में अधिक तथा रात्रि में कम होता है।
पौधों में वाष्पोत्सर्जन निम्न प्रकार का होता हैै।
रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन- पत्तियों, हरे तनो तथा कुछ रूपांतरित तनो की सतह पर असंख्य छोटे-छोटे रंध्र (छिद्र) होते हैं। इन रन्ध्रों द्वारा पादप कोशिकाओं को श्वसन के लिए ऑक्सीजन मिलती है। एक जोड़ी वृत्ताकार रन्ध्र कोशिकाएं इन रन्ध्रों के खुलने व बंद होने का नियंत्रण करती है। 90% वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रों द्वारा होता है।
उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन - पौधों का बाहरी भाग व पत्तियां उपत्वचा या क्यूटिकल की परत द्वारा ढके रहते हैं। इसके द्वारा वाष्पोत्सर्जन 5-10% होता है।
वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन - कुछ काष्ठीय तनों में तथा फलों में वातरंध्र पाए जाते हैं। वातरन्ध्र बहुत छोटे छिद्र होते हैं। इनके द्वारा लगभग 1% वाष्पोत्सर्जन होता है।
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक
पादपों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में बांट सकते हैं।
बाह्य कारक
- वायुमंडलीय आर्दृता- वायु की आद्रता बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है तथा आद्रता घटने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
- वायु की गति- वायु गति जितनी अधिक होगी वाष्पोत्सर्जन की दर भी अधिक होगी।
- तापमान - वायुमंडली ताप में वृद्धि होने के कारण वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। तापमान कम होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
- प्रकाश तीव्रता- प्रकाश की तीव्रता में वृद्धि के साथ तापमान में वृद्धि होती है। तथा वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
- वायुदाब- वायुदाब कम होने पर वायु की जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता अधिक हो जाती है। जिससे वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
आंतरिक कारक
वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने वाले कुछ कारक
- उपचर्म का मोटा होना।
- बाह्य त्वचा पर रोम, श्लक आदि उपस्थित होना।
- बाह्य त्वचा का बहुस्तरीय होना।
- रन्ध्रों की संख्या अथवा घनत्व में कमी होना।
- *पत्तियों का छोटा होना, कांटों में बदल जाना।
वाष्पोत्सर्जन का महत्व
- ताप का नियमन- वाष्पोतर्जन के कारण जल की वाष्प बनती है, जिससे ठंडक पैदा होती है। अतः पादप तेज गर्मी में झुलसने से बच जाते हैं।
- खनिज लवणों की प्राप्ति- पादपों में जल अवशोषण के साथ ही खनिज लवणों का भी अवशोषण होता है। अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण ही अधिक जल अवशोषित होता है। जिसके साथ अधिक खनिज लवण की आवश्यकता की भी पूर्ति होती है।
- अतिरिक्त जल का निस्तारण- मूलरोम लगातार भूमि से जल अवशोषित करते हैं। इनमें परासरण व अंतः चूषण क्रिया होने के कारण अधिक जल का जमाव हो सकता है। अतः वाष्पोत्सर्जन द्वारा इसका संतुलन बनाए रखते हैं।
- वाष्पोत्सर्जन तथा रसारोहण- वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न चूषण दाब उत्पन्न होता है जो रसारोहण के लिए अति आवश्यक है।
- फलों में शर्करा की सांद्रता- अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण फलों में शर्करा की सांद्रता बढ़ जाती है जिससे फल अधिक मीठे हो जाते हैं।
रन्ध्र की संरचना
रन्ध्र पत्तियों तथा तनो की सतह पर पाए जाने वाले सूक्ष्म छिद्र होते हैं। रंध्र पत्तियों की ऊपरी तथा निचली दोनों सतहों पर उपस्थित होते हैं। परंतु निचली सतह पर ऊपरी सतह की तुलना में रन्ध्रों की संख्या अधिक होती है। प्रत्येक रन्ध्र दो वृक्क के समान अथवा सेम के आकार की कोशिकाओं के द्वारा घिरा होता है। जिन्हें रक्षक कोशिकाएं या द्वारा कोशिकाएं कहते हैं। रक्षक कोशिकाएं विशेष प्रकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं के द्वारा घिरी रहती है। जिन्हें सहायक कोशिका कहते हैं।
रन्ध्रों के खुलने बंद होने की क्रिया विधि
रन्ध्र का निर्माण दो विशेष प्रकार की द्वार कोशिकाओं के द्वारा होता है इन्हीं कोशिकाओं की स्फीति के कारण आकार में परिवर्तन पर रंध्र का छोटा या बड़ा होना निर्भर करता है। जब ये कोशिकाएं स्फीति होती है तो रन्ध्र खुला रहता है तथा जब श्लथ होती है। तो रन्ध्र बंद हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की स्फीति में परिवर्तन उनके परासरण दाब में परिवर्तन पर निर्भर करता है। परासरण दाब बढ़ने पर आसपास की सहायक कोशिकाओं से परासरण की क्रिया के द्वारा पानी आ जाता है और द्वार कोशिकाएं स्फीति हो जाती है। अतः भीतरी मोटी भित्ति, बाहरी भित्ति के बाहर की ओर फूलने के कारण द्वार कोशिका के अंदर ही घुस जाती है। इसके फलस्वरूप रन्ध्र खुल जाता है। परासरण दाब घटने पर द्वार कोशिकाओं से जल पड़ोसी कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये श्लथ हो जाती है और रन्ध्र बंद हो जाते हैं।











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