नियंत्रण एवं समन्वयन Part-1/Class 10/ Lesson 7
नियंत्रण एवं समन्वयन (Control and Co-ordination)
सभी जीवो में चेतना होती है। इसी गुण के कारण जीवधारी अपने बाह्य तथा आंतरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को जान पाते हैं और उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं। वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को उद्दीपन कहते हैं और उद्दीपन के प्रति दिखाई गई प्रतिक्रिया को अनुक्रिया कहते हैं। जीवो में बाह्य व भीतरी वातावरण के बीच संतुलन या तालमेल बनाए रखने की क्षमता को नियंत्रण या होमियोस्टैसिस तथा सामान्य स्थिति बनाए रखने की प्रतिक्रियाओं को समन्वयन कहते हैं।
मानव में समन्वयन
मानव में नियंत्रण तथा समन्वयन तंत्रिका तंत्र तथा पेशी ऊतक द्वारा किया जाता है-
तंत्रिका तंत्र -
तंत्रिका तंत्र केवल जंतुओं में ही होता है। पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं पाया जाता है। तंत्रिका तंत्र का कार्य हमारे शरीर में होने वाली विभिन्न क्रियाओं में समन्वय बनाए रखने का है। इसका निर्माण तंत्रिका कोशिकाओं से होता है। तंत्रिका कोशिकाएं, उद्दीपनों से सूचनाओं को ग्राही अंगों के द्वारा ग्रहण करके तीव्र गति से शरीर के अन्य भागों तक पहुंचाती है।
मनुष्य में तंत्रिका तंत्र
सभी स्तनधारियों तथा मनुष्य में तंत्रिका तंत्र का निर्माण विशेष प्रकार की तंत्रिका ऊतकों द्वारा होता है। तंत्रिका ऊतक में विशिष्ट कोशिकाएं तंत्रिका कोशिकाएं या न्यूरॉन होती है। न्यूरॉन को तंत्रिका तंत्र की इकाई भी कहते हैं।
तंत्रिका कोशिका या न्यूरॉन की संरचना
तंत्रिका कोशिकाएं 1.5 मीटर से 2 मीटर तक लंबी होती हैं एक तंत्रिका कोशिका के निम्नलिखित तीन भाग होते हैं।
1-कोशिकाकाय या Cyton
2- वृक्षिकाएं या Dendron
3- तंत्रिकाक्ष या Axon
1-कोशिकाकाय या Cyton- यह तंत्रिका कोशिका का मुख्य भाग है इसमें एक केंद्रक व चारों ओर कोशिकाद्रव में प्रोटीनयुक्त निसिल के कण होते हैं।
2- वृक्षिकाएं या Dendron- यह कोशिकाकाय से निकले प्रवर्ध हैं। जिन्हें Dendron कहते हैं प्रत्येक Dendron में भी पतले प्रवर्ध निकले रहते हैं यह अन्य तंत्रिका कोशिकाओं के डेट्राइट््स से सिनैप्स द्वारा जुड़े रहते हैं।
3- तंत्रिकाक्ष या Axon - कोशिकाकाय से न्यूरिलेमा नामक झिल्ली में बंद लंबा व सामान मोटाई का बेलनाकार प्रवर्ध निकलता हैै। जिसे Axon कहते हैं। न्यूरिलेमा तथा Axon के बीच वसा का बना आच्छद (Sheath) होता ।जिसे माइलिनी शीथ कहते हैं। यह थोड़ी थोड़ी दूर पर टूटा रहता है। इन स्थानों को रैनवेयर का नोड कहते हैं। Axon के अंतिम सिरों पर घुंडी जैसी संरचनाएं होती है। जिन्हें सिनैप्टिक घुंडिया कहते हैं।
कार्य के आधार पर तंत्रिका कोशिकाएं तीन प्रकार की होती हैं।
1- संवेदी तंत्रिका कोशिकाएं- संवेदी तंत्रिका कोशिकाएं संवेदी अंगों में स्थित होती है। यह अंगों से संवेदनाओं को ग्रहण करती हैं। तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क) को पहुंचाती हैं।
2- चालक या प्रेरक तंत्रिका कोशिकाएं- ये तंत्रिका कोशिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से संदेश लेकर कार्यकारी अंगों (पेशियों, ग्रंथियों) आदि तक पहुंचाती हैं।
3- साहचर्य (मध्यस्थ) तंत्रिका कोशिकाएं- ये संवेदी तथा चालक तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संबंध स्थापित करती हैं अर्थात संवेदनााओं को पेशियों से मस्तिष्क की ओर लाने तथा मस्तिष्क से पेशियों की ओर ले जाने का कार्य करती हैं।
तंत्रिका तंत्र का वर्गीकरण
कशेरुकियों मे तंत्रिका तंत्र को निम्नलिखित तीन भागों में बांटा जा सकता है-
1-केंद्रीय तंत्रिका तंत्र
2-परिधीय तंत्रिका तंत्र
3-स्वायत्त तंत्रिका तंत्र
1-केंद्रीय तंत्रिका तंत्र-
सभी कशेरुकियों में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के दो प्रमुख भाग होते हैं।
मस्तिष्क,
मेरुरज्जु
मानव मस्तिष्क- खोपड़ी के कपाल में बंद मेरु रज्जू का अगला चौड़ा भाग मस्तिष्क कहलाता है। मनुष्य का मस्तिष्क अत्यंत विकसित तथा अति कोमल अंग है। यह तीन मस्तिष्कावरण झिल्लियों ड्यूरामेटर (सबसे बाहरी झिल्ली), ऐरेक्नाॅइड (मध्य झिल्ली) तथा पायामेटर (अन्त: झिल्ली) द्वारा ढका रहता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं-
1-अग्र मस्तिष्क- यह मस्तिष्क का प्रमुख भाग बनाता है। यह भी दो भागों का बना होता है- सेरीब्रम ,डाइनासिफेलाॅन।
- प्रमस्तिष्क या सेरीब्रम- यह दो गोलार्धों का बना हुआ मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग हैै। प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्ध में तीन गहरी दरारें होती हैं। जिनके कारण यह चार भागों में बट जाता है। सेरीब्रम में देखने सुनने के अलग-अलग केन्द्र होते हैं। यह मनुष्य की चेतना, स्मृति,तर्क, हृदय की गति, भोजन ग्रहण करना, प्रेम, विषाद, दु:ख, भय आदि का भी केंद्र है इस भाग के अल्प विकसित रह जाने पर मनुष्य अधिक बुद्धिमान नहीं होता है। सेरीब्रम मस्तिष्क के अन्य भागों पर भी नियंत्रण रखता है।
- डाइनासिफेलाॅन- यह अग्र मस्तिष्क का पिछला भाग है। इस भाग से पीनियल काय तथा पिट्यूटरी ग्रंथि जुड़ी होती है। थैलेमस व हाइपोथैलेमस इसी के भाग हैं थैलेमस दर्द, ठंड व गर्म को पहचानने का कार्य करता है जबकि हाइपोथैलेमस भूख ,प्यास , प्यार घृणा व ताप नियंत्रण आदि का केंद्र है।
3- पश्च मस्तिष्क या अनुमस्तिष्क- यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग में नीचे की ओर स्थित होता है। यह प्रमस्तिष्क से छोटा तथा दो भागों सेरीबेलम व मेड्यूला ऑबलांगेटा का बना होता है। यह गति नियंत्रण, समन्वय, शरीर का संतुलन तथा ऐच्छिक पेशियों की क्रिया का नियमन करता है। मस्तिष्क का सबसे पिछला तथा बेलनाकार भाग अनुमस्तिष्क है। यह भाग श्वसन तंत्र, ह्रदय व परिसंचरण तंत्र आदि पर नियंत्रण के साथ-साथ शरीर के ताप को नियंत्रित करता है।
मेरुरज्जु (Spinal Cord) की संरचना-
मेड्यूला ऑबलांगेटा खोपड़ी के महारन््ध्र से निकलकर रीढ़ की हड्डी के मध्य में स्थित तंत्रिका नाल से होताा हुआ, अंत तक फैला रहता है। जिसेे रीढ़ रि रज्जू या मेरुरज्जु कहते हैं। यह एक लंबी खोखली बेलनाकार रचना होती है। मस्तिष्कक के समान ही यह तीन झििल्लियों से ढकी रहती है। मेरुरज्जु में बाहर की ओर श्वेत दृव तथा भीतर की ओर धूसर दृृव होता है। परंतु इसका धूूूूसर दृव 'H' आकृति का होता हैै।
मेरू रज्जू के कार्य
* यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का मुख्य केंद्र है।
* यह अनैच्छिक क्रियाओं को संतुलित करती है।
* मेरु रज्जू मस्तिष्क को जाने वाली तथा मस्तिष्क से आने वाली प्रेरणाओं के लिए मार्ग प्रदान करती है।
प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action)-
ऐसी अनैच्छिक क्रिया है जो किसी उत्तेजना के फलस्वरुप हमारे दैनिक जीवन में अपने आप होती रहती हैं। प्रतिवर्ती क्रिया कहलाती हैं। प्रतिवर्ती क्रियाओं पर मेरु रज्जू का नियंत्रण होता है। मस्तिष्क का क्रियाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
प्रतिवर्ती क्रिया के उदाहरण - यदि अनजाने में आपका हाथ किसी गर्म चीज से छू जाता है या कोई आपके हाथ में पिन चुभा देता है तो आप तुरंत अपने हाथ को पीछे हटा लेते हैं। हाथ हटाने के पश्चात ही आपको दर्द का अनुभव होता है। इस क्रिया में बहुत कम समय लगता है। तेज रोशनी में पलकें एकदम झुक जाती हैं या जोर की आवाज सुनते ही मुंह खुल जाता है। इस प्रकार की सभी क्रियाओं को प्रतिक्रियाएं कहते हैं यह दो प्रकार की होती है।
1- प्राकृतिक या आबंधित प्रतिवर्ती क्रिया
2- उपार्जित या अनुबंधित प्रतिवर्ती क्रिया
1- प्राकृतिक या आबंध प्रतिवर्ती क्रिया- इसमें पहले से किसी अनुभव अथवा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। यह प्रतिवर्ती जन्मों से वंशागत रूप में प्राप्त होती है। इन के कुछ सामान्य उदाहरण इस प्रकार से हैं।
- जब कोई वस्तु अचानक आपके पास आती है तो पलके तुरंत बंद हो जाती है।
- जब कभी भोजन गलत तरीके से निगलने पर सांस की नली में चला जाए तो खांसी आती है।
- जब किसी नन्हे शिशु की हथेली में कोई चीज़ रख दी जाए तो वह अपने आप कसकर मुट्ठी में पकड़ लेता है।
2- उपार्जित या अनुबंधित प्रतिक्रिया- यह अनुभव के द्वारा अर्जित होते हैं। जैसे किसी स्वादिष्ट भोजन को देख कर मुंह में पानी आ जाना (लार निकलना)। वास्तव में मस्तिष्क को भोजन का स्वाद याद आ जाता है और वह अनजाने में ही कार्य करने लग जाता है। इसके कुछ उदाहरण निम्मखित हैं।
- यदि कोई व्यक्ति अचानक आपकी साइकिल के सामने आ जाए तो आप तुरंत ब्रेक लगा लेते हैं।
- सर्कस में जंगली जानवरों को अजीब अजीब करतब करने आ जाते हैं।
- अगर आप केवल अपने हाथ में पत्थर उठा रहे हो ं तो आपको देखकर कुत्ता दूर से ही भाग जाता है।
प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc)-
संवेदक से लेकर वाहक अंत तक के इस प्रकार के आवेग मार्ग को प्रतिवर्ती चाप कहते हैं इसमें निम्नलिखित अंग होते हैं ग्राही अंग, संवेदी न्यूरॉन, सह बंधक न्यूरॉन, चालक न्यूरॉन, तथा कार्यकर अंग आदि।
2- परिधीय तंत्रिका तंत्र-
परिधीय तंत्रिका तंत्र में दो प्रकार की तंत्रिकाएं होती है- कपालीय तंत्रिकाएं तथा रीढ़ तंत्रिकाएं
- कपालीय तंत्रिकाएं- कपालीय तंत्रिकाएं मस्तिष्क के विभिन्न भागों से जुड़ी होती हैंं। मनुष्य में इनकी संख्या 12 जोड़ी होती है यह मुख्यतः तीन प्रकार की (संवेदी प्रेरक अथवा मिश्रिित) होती हैं। यह मस्तिष्क से प्राप्त प्रेरणा को अपवाहक अंगों तक पहुंचाती हैं।
- रीढ़ तंत्रिकाएं- मनुष्य में यह 31 जोड़ी होती है। यह मिश्रित होती है।
3- स्वायत्त तंत्रिका तंत्र-
यह तंत्र स्वतंत्र रूप से कार्य करता है किंतु अंतिम रूप से इसका नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र द्वारा ही होता है। यह विभिन्न प्रकार की अनैच्छिक क्रियाओं को समुचित रूप से चलाने के लिए होता है। इस तंत्र की तंत्रिकाएं उन अंगों के कार्यों का नियंत्रण करती हैं। जो हमारी इच्छा के अधीन कार्य नहीं करते हैं, जैसे श्वसन, हृदय की धड़कन , आहार नाल में क्रमांनुकुंचन आदि। इस तंत्र में भी दो प्रकार की तंत्रिकाएं होती हैं। अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र तथा परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र। यह दोनों तंत्र एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं, जैसे अनुकम्पी ह्रदय धड़कन को बढ़ाता है जबकि परानुकम्पी ह्रदय धड़कन को घटाता है।
जंतुओं में हार्मोन्स (Hormones in Animals)
उच्च कोटि के जंतुओं (जैसे मनुष्य) में तंत्रिका तंत्र के अतिरिक्त कुछ विशेष ग्रंथियों के द्वारा शारीरिक क्रियाओं का नियंत्रण होता है। ये ग्रंथियां विशेष प्रकार के रासायनिक पदार्थों का स्त्रावण करती है। जिन्हें हार्मोन कहते हैं। हार्मोन स्रावित करने वाली ग्रंथियों को नलिका विहीन ग्रंथि या अंतः स्त्रावी ग्रंथियां कहते हैं।
अंत: स्रावी ग्रंथियां- वे ग्रंथियां जो अपना स्त्राव सीधे रुधिर में छोड़ती हैं। क्योंकि इन ग्रंथियों में वाहिकाएं नहीं होती हैं। अतः ये अपना स्त्राव सीधे सुधीर में छोड़ती है। इन ग्रंथियों को अंतः स्त्रावी ग्रंथियां कहते हैं। प्रत्येक हार्मोन्स विशिष्ट अंग की कोशिकाओं के कार्यों को ही प्रभावित करता है। हार्मोन्स शरीर के उपापचय ,वृद्धि ,जनन, रुधिर दाब, रुधिर में जल और लवण की मात्रा का सन्तुलन आदि क्रियाओं का नियंत्रण करते हैंं। कुछ हार्मोन प्रेरक और कुछ निरोधक प्रकार के होते हैंं। हार्मोन की सामान्य मात्रा में थोड़ी सी कमी या अधिकता होने से ही शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
मनुष्य में अंतः स्रावी ग्रंथियां
मनुष्य के शरीर में निम्नलिखित स्त्रावी ग्रंथियां पाई जाती है-
- पीयूष ग्रंथि या पिट्यूटरी ग्रंथि
- थायराइड ग्रंथि
- पैराथायराइड ग्रंथि
- अधिवृक्क ग्रंथि
- पीनियल ग्रंथि
- थाइमस ग्रंथि
- अग्नाशय ग्रंथि
1- पीयूष ग्रंथि या पिट्यूटरी ग्रंथि - पीयूष ग्रंथि को मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं। यह एक मटर के दाने के आकार की ग्रंथि हैै। जो अग्र मस्तिष्क के पश्च भाग में डाइएनसिफेलाॅन नामक संरचना के अधर तल पर स्थित होती है।
पीयूष ग्रंथि के अग्र पिण्ड से निकलने वाले हार्मोन निम्न प्रकार हैं-
- वृद्धि हार्मोन या सोमेट्रोपिन (STH)
- एड्रनोकोर्टिकोट्रॉपिक हार्मोन (ACTH)
- फाॅलिकल उत्तेजक हार्मोन (FSH)
- थायराइड उत्तेजक हार्मोन (TSH)
- प्रोलैक्टिन हार्मोन (PRL)
- ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH)
पीयूष ग्रंथि के पश्च पिण्ड से निकलने वाले हार्मोन निम्नलिखित है-
- वेसोप्रोसिन हार्मोन
- ऑक्सीटोसिन हार्मोन
2- थायराइड ग्रंथि - मनुष्य में यह ग्रंथि गर्दन में श्वास नली व स्वरयंत्र के संयोजन स्थल के अधर तल पर पाई जाती है। गुलाबी रंग की यह ग्रंथि 'एच' के आकार की होती है। मनुष्य में इस ग्रंथि का भार 25 से 30 ग्राम होता है। यह ग्रंथि रुधिर से आयोडीन लेकर शुरू में थायरोक्सिन तथा ट्राई आयोडो थायोरोनिन नामक दो हार्मोन का संश्लेषण करती है। मनुष्य में घेंघा रोग इस ग्रंथि के फूल जाने के कारण होता है। क्योंकि आयोडीन की कमी से यह ग्रंथि फूल जाती है और घेंघा रोग हो जाता है।
3- पैराथायराइड ग्रंथि - पैराथायराइड ग्रंथि संख्या में चार होती है यह पैराथाॅरमोन हार्मोन स्रावित करती हैं। पैराथाॅरमोन हार्मोन शरीर में कैल्शियम व फास्फेट के उपापचय पर नियंत्रण रखता है। इसकी कमी से अस्थियां कोमल तथा टेढ़ी हो जाती है।
4- अधिवृक्क ग्रंथि - मनुष्य के प्रत्येक व्यक्ति के अगले सिरे पर एक टोपी के आकार की सिकुड हुई छोटी सी अधिवृक्क या एड्रिनल ग्रंथि पाई जाती है। इसका भार लगभग 4 से 6 ग्राम होता है। इससे स्त्रावित एल्डोस्टेरोन हार्मोन के कारण शरीर में रुधिर की मात्रा एवं दाब सामान्य बना रहता है। तथा काॅॅर्टिसोन नामक हार्मोन गठिया जैसे रोगों को रोकने में सहायता करता है ।
5- पीनियल ग्रंथि - यह एक सफेद रंग की छोटी वह चपटी सी संरचना होती है। यह मस्तिष्क के थैलेमस भाग से एक तन्तु द्वारा जुड़ी होती है। इस ग्रंथि से मिलेटोनिन नामक हार्मोन का स्त्रावण होता है। यह हार्मोन लैंगिक क्षमताओं एवं जननांगों के विकास का अवरोधन करता है। मनुष्य में यह ग्रंथि 10 वर्ष की उम्र के बाद नष्ट होने लगती है।
6-थाइमस ग्रंथि- यह गुलाबी रंग की चपटी वह द्विपालित ग्रंथि होती है। यह वक्ष भाग के मध्य में हृदय के ठीक आगे स्थित होती है। यह ग्रंथि नवजात शिशुओं में प्रतिरक्षी तंत्र की भांति कार्य करती है इसमें थाइमोसिन नामक हार्मोन का स्त्रावण होता है। जो शिशु के शरीर में प्रविष्ट जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। यह ग्रंथि 2 वर्ष के शिशु में अन्य अंगों की अपेक्षा काफी बड़ी होती है।
7- अग्नाशय ग्रंथि (Pancreas Gland)- मनुष्य की उदर गुहा में लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी गुलाबी रंग की अग्नाशय नामक एक मिश्रित ग्रंथि पाई जाती है इस ग्रंथि का लगभग 98 प्रतिशत भाग पाचक रसों (एंजाइम्स) का स्त्रावण करने वाली कोशिकाओं द्वारा बने खोखले पिंडों का बना होता है। जिन्हें लैंगरहैंस के द्वीप कहते हैं अतः इनमें तीन प्रकार की अंतः स्त्रावी कोशिकाएं होती हैं।
- एल्फा कोशिकाएं - यह ग्लूकैगाॅन नामक हार्मोन का स्त्रावण करती है। ये कोशिकाएं रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा कम होने पर इस हार्मोन का स्त्रावण करती है। यह हार्मोन यकृत में संचित ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में बदल देता है। जो रुधिर में पहुंचकर ग्लूकोज की मात्रा को सामान्य बनाता है।
- बीटा कोशिकाएं - यह कोशिकाएं इंसुलिन नामक महत्वपूर्ण हार्मोन का स्त्रावण करती है। इंसुलिन रुधिर में ग्लूकोस का नियमन करता है। इंसुलिन के अल्प स्त्राव से रुधिर में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ जाती है। इस रोग को मधुमेह या डायबिटीज रोग कहते हैं।
- डेल्टा या गामा कोशिकाएं- यह कोशिकाएं सोमेटोस्टेटिन हार्मोन का स्त्रावण करती हैं जो ग्लूकैगाॅन एवं इंसुलिन के स्त्रावण को रोकता है।
8- वृषण (Testes)- यह केवल पुरुषों में पाए जाते हैं। यह मनुष्य के मुख्य नर जनन अंग है। इनमें प्रमुख एंड्रोजन, टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित होता है।
9- अंडाशय (Ovaries)- अंडाशय केवल स्त्रियों में पाए जाते है। यह मनुष्य के मुख्य मादा जनन अंग है। इनसे निम्नलिखित तीन प्रकार के हार्मोन स्रावित होते हैं। एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन तथा रिलैक्सिंग ।
अंतः स्त्रावी ग्रंथियों पर पुनर्निवेश नियंत्रण
हार्मोन्स की अधिकता या कमी हमारे शरीर के लिए हानिकारक है। उनमें अधिकांश में पुनर्निवेश या पुनर्भरण नियंत्रण होता हैै। इसके अनुसार शरीर में किसी तत्व की कमी या किसी रासायनिक प्रक्रिया में बने उत्पादों की मात्रा कम होने पर प्रक्रिया की दर बढ़ जाती है। अतः पुनर्निवेश नियंत्रण में अंतिम उत्पाद प्रक्रिया की दर को नियंत्रित करते हैं। यह दो प्रकार का होता है-
- धनात्मक पुनर्निवेश - किसी तंत्र की कार्यिकी के प्रभाव या किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्पन्न उत्पाद प्रभाव सीमा से कम हो जाने पर इस तंत्र की कार्यिकी की की दर बढ़ जाती है।
- ऋणात्मक पुनर्निवेश - इस प्रकार के समस्याओं में किसी तंत्र की कार्यिकी का प्रभाव या किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्पन्न उत्पाद सीमा से अधिक हो जाने पर कार्यिकी की दर को घटा देता है।
ताप नियंत्रण में हाइपोथैलेमस की भूमिका
सामान्यतः मनुष्य के शरीर का ताप 98.6F या 37 डिग्री सेल्सियस होता है। दौड़ने, व्यायाम करने या शरीर श्रम करने में ऊर्जा का उपभोग होता है और साथ ही ऊष्मा मुक्त होती है। जिससे का तापमान बढ़ जाता है। इस अवस्था में मस्तिष्क के अधर तल पर स्थित हाइपोथैलेमस का थर्मोस्टेट (ताप नियंत्रण) सक्रिय हो जाता है। जिसके फलस्वरूप मोटर तंत्रिका द्वारा त्वचा की रुधिर कोशिकाओं का विस्तारण होता है। तथा पसीने की ग्रंथियां सक्रिय हो जाती है। स्वेद ग्रंथियों सेे स्वेद(पसीना) निकलता है। जिसके वाष्पीकरण से भी ऊष्मा का क्षय होता है और शरीर का तापमान कम हो जाता है।








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