Life process Part-3/Class 10/ Lesson 6
Class 10 Biology
Chapter-6/ part -3
जैव प्रक्रम-
परिवहन (Transportation)
सजीवों के अंदर लगातार चलने वाली जैविक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर के विभिन्न अंगों, ऊतकों एवं कोशिकाओं को बाह्य वातावरण से ऑक्सीजन, पोषक पदार्थ, भोजन तथा पानी की आपूर्ति निरंतर बनी रहे। पता है शरीर के एक भाग से शरीर के दूसरे भाग में इन पदार्थों को पहुंचाना ही परिवहन कहलाता है किंतु जटिल संरचना के जीवों में पूर्ण विकसित परिवहन तंत्र होता है।
परिवहन तंत्र के प्रकार
तरल अथवा बहने वाले दृव के आधार पर परिवहन तंत्र निम्न तीन प्रकार के होते हैं-
1- जल परिवहन तंत्र- कुछ जलीय जीवों जैसे स्पंज सीलेन्टृॆट्स (हाइड्रा) व सितारा मछलियों में जल शरीर के अंदर आवश्यक पदार्थों का संवहन करता है।
2-रुधिर परिवहन तंत्र- इस परिवहन तंत्र में रुधिर संवहन माध्यम होता है। यह सभी कशेरुकी जंतुओं, केंचुऔं व कीटों में पाया जाता है।
3- लसिका परिवहन तंत्र- लसिका वास्तव में छना हुआ रुधिर होता है। कशेरुकी जंतुओं में रुधिर ऊतक कोशिकाओं के सीधे संपर्क में नहीं होता है, बल्कि वह कोशिकाओं से छनकर लसिका दृव के रूप में ऊतक कोशिकाओं के संपर्क में आता है इस दृव का ऊतक के साथ सीधा संपर्क होता है। इस तंत्र को लसिका तंत्र कहते हैं।
खुला व बंद परिवहन तंत्र
कुछ अकशेरुकी जंतुओं जैसे आर्थ्रोपोड्स एवं मौलस्क में रुधिर मुख्य रुधिर वाहिनियों से निकलकर पूरी देहगुहा में भर जाता है। और दैहिक अंगों की कोशिकाओं के सीधे संपर्क में रहता है इस प्रकार के परिवहन तंत्र को खुला रुधिर परिवहन तंत्र कहते हैं।उदाहरण कॉकरोच, बिच्छू एवं कीट आदि। सभी कशेरुकी जंतुओं में रुधिर सदैव बंद वाहिनियों में बहता है रुधिर कभी भी ऊतक कोशिकाओं के सीधे संपर्क में नहीं आता है। रुधिर हृदय से धमनी द्वारा कोशिकाओं में पहुंचाता है। वहां से शियाओं द्वारा रुधिर वापस हृदय में लौट आता है अतः इसे बंद रुधिर परिसंचरण तंत्र कहते हैं मनुष्य तथा केंचुए में बंद रुधिर परिवहन तंत्र पाया जाता है।
मानव में परिवहन
मनुष्य में बंद रुधिर परिवहन तंत्र(परिसंचरण तंत्र) पाया जाता है। रुधिर परिसंचरण तंत्र की खोज विलियम हार्वे ने (1578 -1657) ने की थी। रुधिर परिसंचरण तंत्र के अंतर्गत रुधिर, ह्रदय, तथा रुधिर वाहिनियां आदि अंग आते हैं।
रुधिर ( Blood)- एक तरल संयोजी उत्तक है जिसकी उत्पत्ति भ्रूण के मध्य जननस्तर (Mesoderm) से होती है। यह जल से कुछ भारी, चिपचिपा, स्वाद में नमकीन, हल्का क्षारीय तथा अपारदर्शी पदार्थ है। मानव शरीर में रक्त की मात्रा शरीर के भार की लगभग 7 से 8% होती है अतः एक 70 किलोग्राम के मनुष्य के शरीर में औसतन 5 से 6 लीटर रुधिर होता है। स्त्रियों में रुधिर की मात्रा कुछ कम होती है। रुधिर निम्नलिखित दो घटकों से मिलकर बना होता है।
1-प्लाज्मा ,
2- रुधिराणु या रुधिर कणिकायें
1- प्लाज्मा- यह रुधिर का लगभग 55% भाग बनाता है इसमें 90% जल तथा 10% में जटिल कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ होते हैं इसे रुधिर का निर्जीव भाग कहते हैं यह रुधिर का तरल अवयव है। और इसमें रुधिर कणिकाओं का अभाव होता है।
2- रुधिराणु या रुधिर कणिकायें- यह रुधिर का लगभग 45% भाग बनाते हैं यह रुधिर का ठोस अवयव है। मानव में रुधिर कणिकाएं निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं।
- लाल रुधिर कणिकाएं
- श्वेत रुधिर कणिकाएं
- रुधिर प्लेटलेट्स
लाल रुधिर कणिकाएं - मानव रुधिर में इनकी मात्रा सबसे अधिक होती है। यह लाल रंग की केंद्रक रहित तथा उभयावतल कणिकाएं होती हैं। इनका लाल रंग इन में उपस्थित हीमोग्लोबिन नामक श्वसन वर्णक के कारण होता है। यह ऑक्सीजन के परिवहन में कार्य करती हैं। इनका जीवन काल लगभग 120 दिन का होता है। मनुष्य के एक घन मिली रुधिर में पुरुषों में इसकी मात्रा लगभग 55 लाख प्रति घन मिली तथा स्त्रियों में लगभग 4500000 प्रति घन मिली होती है।
श्वेत रुधिर कणिकाएं - ये लाल रुधिर कणिकाओं से बड़ी, संख्या में कम ,केंद्रक युक्त , अमीबाभ तथा रंगहीन कणिकाएं होती हैं। इनका जीवनकाल 1 से 2 दिन तक का ही होता हैै। श्वेत रुधिर कणिकाएं हमारे शरीर में रोगाणुओं का भक्षण करती हैं तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करती है। मनुष्य के एक घन मिली रुधिर में इनकी संख्या 5000 से 9500 प्रति घन मिली होती है।
श्वेत रुधिर कणिकाएं दो प्रकार की होती हैं
- कणिकामय श्वेत रुधिर कणिकाएं- इनका कोशिकाद्रव कणिकामय तथा केंद्रक पालीयुक्त होता है। ये असीमित आकृति की होती है।
- कणिकारहित श्वेत रुधिर कणिकाएं- इन श्वेत रुधिर कणिकाओं के कोशिकाद्रव में कणिकाएं नहीं पाई जाती हैं। इनका केंद्रक गोल होता है तथा विंडो में विभाजित नहीं रहता है।
रुधिर प्लेटलेट्स- ये केवल स्तनधारियों के रुधिर में पाई जाती हैं।इनकी बनावट उभयोतल, तश्तरीनुमा होती है। यह चोट लगने पर रुधिर स्कंदन अर्थात रुधिर का थक्का बनाने में सहायक होती है। शरीर में इनकी संख्या 200000 से 500000 प्रति घन मिली होती है।
रुधिर के कार्य (Function of blood)
* फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन का परिवहन करना।
* विभिन्न ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को एकत्रित करके उसका फेफड़ों तक परिवहन करना।
* उपापचय में बने विषैले एवं हानिकारक पदार्थों को एकत्रित करके उपयोगी बनाने के लिए यकृत में भेजना।
* विभिन्न प्रकार के उत्सर्जी पदार्थों का उत्सर्जन हेतु वृक्कों तक पहुंचाना।
* विभिन्न प्रकार के हारमोंस एवं एंजाइम का परिवहन करना।
* छोटी आंत से पाचित भोज्य पदार्थों का अवशोषण भी रक्त प्लाज्मा द्वारा होता है जिसे यकृत और विभिन्न ऊतकों में भेज दिया जाता है।
* शरीर के समस्त अंगों का ताप संतुलित कर लगभग समान बनाए रखने का दायित्व भी निभाता है।
* रुधिर की श्वेत रक्त कणिकाएं, हानिकारक बैक्टीरिया, मृत कोशिकाओं तथा रोगाणुओं का भक्षण करके उन्हें नष्ट कर देता है।
* फाइब्रिनोजेन नामक प्रोटीन रक्त में उपस्थित होती है जो रक्त का थक्का जमने में सहायक होती है।
रुधिर स्कंदन (Blood Clotting)- शरीर से बाहर निकलने तथा वायु के संपर्क में आने पर रुधिर तरल अवस्था से जेली सदृश्य ठोस अवस्था में बदल जाता है। इस घटना को रुधिर स्कंदन कहते हैं। रुधिर स्कंदन के बारे में सर्वप्रथम होवेल ने दिया था। रुधिर स्कंदन के कारण रुधिर की क्षति नहीं होती हैै।
रुधिर समूह (Blood Group)
मनुष्यों में अत्यधिक रक्त स्त्राव होने पर रक्त की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि रक्त की कमी के कारण मृत्यु हो सकती है, परंतु सभी मनुष्यों का रक्त एक जैसा नहीं होता है इसका पता सर्वप्रथम कॉलृ लैंडस्टीनर ने सन्1902 में किया था। उन्होंने बताया कि रुधिर का आदान-प्रदान समान रुधिर वर्गों के व्यक्तियों में होना चाहिए यदि ऐसा नहीं होता है तो दाता के लाल रुधिराणुं ग्राही के रुधिर के साथ मिलकर अभिश्लेषित हो जाते हैं अर्थात परस्पर चिपककर सिक्कों के ढेर जैसी संरचना बना लेते हैं। इसके कारण शरीर में रुधिर का प्रवाह रुक जाता है तथा ग्राही की मृत्यु हो जाती है।
लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थित प्रतिजन तथा प्लाज्मा में उपस्थित प्रतिरक्षी के आधार पर रुधिर को प्रमुख 4 वर्गों में बांटा गया है।
Rh-कारक (Rh-Factor)-
Rh-कारक की खोज रीसस बंदर से हुई। Rh- एंटीजन कोशिकाओं में पाया जाता है जिस व्यक्ति में Rh- एंटीजन पाया जाता है उसे Rh+ व जिसमें Rh– एंटीजन अनुपस्थित होता है। उसे आरएच नेगेटिव कहते हैं आरएच पॉजिटिव व्यक्ति आरएच नेगेटिव को रक्तदान नहीं कर सकता है यदि पति का रक्त समूह आरएच पॉजिटिव हैै उसकी पत्नी का रक्त समूह आरएच नेगेटिव हो तो उसकी दूसरी Rh पॉजिटिव संतान की मृत्युु इरिथोब्लास्टोसििस फीटेेेेलिस द्वारा हो जाती हैै।
होमियोस्टैसिस- जंतुओं द्वारा आंतरिक वातावरण को बाहरी वातावरण की तुलना में स्थिर बनाए रखने की क्रिया को समस्थैतिकी या होमियोस्टैसिस कहते हैं। शरीर में ताप नियमन ,रक्त ग्लूकोज मात्रा का नियमन ,सीरम में सोडियम, पोटेशियम का नियमन, रक्त में जल की मांग का नियमन आदि होमियोस्टैसिस के उदाहरण हैं।
लसिका तंत्र
रुधिर परिवहन तंत्र के अलावा बंद वाहिनीयों का एक अन्य परिसंचरण तंत्र होता है। जिसे लसिका तंत्र कहते हैं जैसा कि आप जानते हैं कि रक्त कोशिकाओं तथा अंतरकोशिकीय तरल के बीच पदार्थों का निरंतर आदान-प्रदान होता है। कुछ पदार्थ जैसे कि प्रोटीन आदि जो इस तरह से वापस रक्त में नहीं आ सकते हैं। वह लसिका तंत्र में लसिका के रूप में आ जाते हैं। और इसके द्वारा गर्दन के निचले हिस्से में शिराओं में छोड़ दिए जाते हैं। इस प्रकार लसिका एक स्वच्छ, रंगहीन तरल पदार्थ होता है जो रक्त कोशिकाओं की दीवार से बाहर आ जाता है। और तमाम ऊतक गुहाओं को तर किए रहता है। इसकी संरचना रक्त जैसी ही होती है परंतु हीमोग्लोबिन ना होने के कारण यह लाल नहीं होता है। अर्थात रंगहीन होता है। यह ऊतक से हृदय की ओर (केवल एक दिशा में) बहता है। लसिका तंत्र में अनेक लसिका वाहिनीयां, लसिका ग्रंथियां तथा लसिका वाहिनिकाएं होती है। इस तंत्र में कोई पंप करने वाला हृदय नहीं होता है। तरल लसिका पेशी गति के द्वारा धक्का दिए जाकर प्रभावित किया जाता है।
लसिका तंत्र के कार्य
* पोषी पदार्थों, गैस, हार्मोन आदि को कोशिकाओं तक पहुंचाना।
* ऊतकों से हानिकारक व उत्सर्ज पदार्थों को रक्त तक पहुंचाना।
* लसिका गांठों द्वारा लसिकाणुओं का निर्माण होता है जो कि युवाणुओं का भक्षण करके प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं।
* आंत में लसिका कोशिका पाया जाता है यह वसा के अवशोषण में सहायक होता है।
ह्रदय (Heart)
मनुष्य का हृदय मुट्ठी के साइज का, शंक्वाकार पेशीय अंग है जो कि दोनों फेफड़ों के मध्य कुछ बांयी और स्थित होता है। एक सामान्य व्यक्ति का हृदय लगभग 12 से तेरे से 13 सेंटीमीटर लंबा तथा अग्रसर ए पर लगभग 9 सेंटीमीटर चौड़ा तथा 6 सेंटीमीटर मोटा होता है इसका भार लगभग 300 ग्राम होता है। यह हृदयावरण नामक थैली में सुरक्षित रहता है इस थैली में हृदयावरणी दृव भरा रहता है जो बाहरी आघातों से हृदय की रक्षा करता है तथा हृदय को नम बनाए रखता है मनुष्य के हृदय में 4 वेश्म होते हैं जो कि पटों द्वारा विभाजित रहते हैं। उपरी वेश्म छोटे और पतले होते हैं। इन्हें अलिन्द कहते हैं। दो अलिन्द पाए जाते हैं दायां अलिन्द व बायां अलिन्द ,तथा दो निलय पाए जाते हैं। दायां निलय व बायां निलय। इस प्रकार हृदय में 4 वेश्म होते हैं।
हृदय की आंतरिक संरचना
हृदय की आंतरिक संरचना ने चारों वेश्म स्पष्ट दिखाई देते हैं। हृदय की भित्तियों के बीच हृदय पेशियों का स्तर बन होता है, जिसे मायोकार्डियम कहते हैं। इसकी भीतरी महीन सतह पर एंडोकार्डियम तथा बाहरी सतह पर एपिकार्डियम होती है। निर्णयों की भित्तियां अलिन्दों की भित्तियों से अपेक्षाकृत मोटी होती हैं। दोनों अलिन्दों को पृथक करने वाले अंतराआलिन्दीय पट के पिछले भाग पर दाहिनी ओर एक छोटा-सा अंडाकार गड्ढ़ा होता है। जिसे फोसा ओवैलिस कहते है। इसी स्थान पर भ्रूण अवस्था में फोरामैन ओवैलिस नामक छिद्र होता है। दाहिने अलिंद में पश्च महाशिरा तथा अग्र महाशिरा अलग-अलग छिद्रों द्वारा खुलती है। बाएं अलिन्द में फेफड़ों से शुद्ध रुधिर लाने वाली फुफ्फुसीय शिराएं खुलती है। दाएं अलिन्द तथा दाएं निलय के बीच में त्रिवलन कपाट होता है। इसी प्रकार बाएं अलिन्द तथा बाएं निलय के बीच में द्विवलन कपाट होता है। ये कपाट रुधिर को केवल अलिन्दों से निर्णयों में जाने देते हैं, किंतु विपरीत दिशा में नहीं आने देते हैं। शरीर के सभी भागों से अशुद्ध रुधिर दाहिने अलिंद में एकत्रित होकर दाहिने निलय में जाता है। फेफड़ों से शुद्ध रुधिर बाएं अलिन्द में आकर बाएं निलय में जाता है। दाहिने निलय के अग्रभाग के बाएं कोने से पलमोनरी महाधमनी तथा बाएं निलय के अग्रभाग के दाएं कोने से दैहिक महाधमनी चापों के रूप में निकलती है।
मानव में दोहरा रुधिर परिसंचरण
मानव ह्रदय शुद्ध रुधिर और अशुद्ध रुधिर को विभिन्न अंगों तक प्रवाहित करता है परिसंचरण के दौरान मानव हृदय में रुधिर दो बार आता है। इसी कारण इस परिसंचरण को हम दोहरा परिसंचरण कहते हैं। इस परिसंचरण को हम दो चरणों में विभक्त कर सकते हैं।
1- फुफ्फुसीय परिसंचरण- मनुष्य के दोहरे परिसंचरण में हृदय के दाएं अलिन्द में संपूर्ण शरीर से अशुद्ध रुधिर आता है। अलिन्द से यह अशुद्ध रुधिर दाएं निलय में पहुंचता है। और दाएं निलय से फिर यह रुधिर फुफ्फुस चाप द्वारा शुद्ध होने के लिए फेफड़ों में चला जाता है। इस पूर्ण परिसंचरण परिपथ को फुफ्फुसीय परिसंचरण कहते हैं।
2- दैहिक परिसंचरण - इस परिसंचरण परिपथ में, जो शुद्ध रुधिर फेफड़ों से फुफ्फुस शिराओं द्वारा हृदय के बाएं अलिन्द में आता है, वह शुद्ध रुधिर बाएं अलिन्द से बाएं निलय में पहुंचता है। और दैहिक महाधमनी द्वारा संपूर्ण शरीर में वितरित हो जाता है इस परिसंचरण को दैहिक परिसंचरण कहते हैं।
हृदय की क्रियाविधि (Mechanism of Heart)
मानव हृदय पंप के समान कार्य करता है एक ओर यह रुधिर को ग्रहण करता है और दूसरी ओर दबाव के साथ उसे अंगों की ओर भेज देता है। यह नियमित रूप से जीवन पर्यन्त काम करता रहता है। एक सामान्य मनुष्य का हृदय 1 मिनट में 72 बार धड़कता है इसे हृदय स्पंदन दर कहते हैं। कार्य करते समय मानव हृदय अपनी पेशियों को क्रमानुसार फैलाता एवं सिकोड़ता रहता है। हृदय की पेशियों के सिकुड़ने की अवस्था को प्रकुंचन (Systole) एवं फैलने की अवस्था को अनुशिथिलन (Diastole) कहते हैं इस प्रकार फैलने सिकुड़ने की क्रिया से एक हृदय स्पंदन बनती है।
रुधिर दाब (Blood pressure)- जिस दाब के साथ रुधिर रुधिर वाहिनीयों में बहता है उस दाब को रुधिर दाब कहते हैं। यह दाब शिराओं की अपेक्षा धमनियों में बहुत अधिक होता है। धमनी के अंदर रक्त का दाब प्रकुंचन रक्तदाब कहलाता है सामान्य प्रकुंचन दाब लगभग 120 मिलीमीटर पारा होता है। तथा शिरा के अंदर रक्त का दाब अनुशिथिलन रक्तदाब कहलाता है सामान्य अनुशिथिलन दाब लगभग 80 मिलीमीटर पारा होता है।
रुधिर वाहिनियां (Blood Vessels)
ये रुधिर को हृदय व ऊतकों के बीच लाती और ले जाती है। इन्हें रक्त वाहिनियां कहते हैं। दिशा और संरचना के आधार पर ये तीन प्रकार की होती हैं। धमनी, शिरा और केशिकाएं।
- धमनी- धमनियां शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) रुधिर को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों एवं ऊतकों में पहुंचाती है। केवल फुफ्फुसीय (पलमोनरी) धमनियां में अशुद्ध रुधिर बहता है। और यह अशुद्ध रुधिर को शुद्धीकरण के लिए फेफड़ों में ले जाती हैं।
- शिरा- शिराएं अशुद्ध रुधिर (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त) को शरीर के सभी अंगों से एकत्रित करके वापस हृदय में लाती हैं। केवल फुफ्फुसीय (पलमोनरी) शिििराा में शुद्ध रुधिर बहता है क्योंकि यह फेफड़ों से शुद्ध रुधिर को हृदय में लाती हैं।
- केशिकाएं- यह धमनी से शिरा तक रुधिर को ले जाने वाली छोटी नलिकाएं होती हैं जो शरीर में उत्तक स्तर तक एक जाल के रूप में बिछी रहती है। वास्तव में अंगों में पहुंचकर धमनियां धमनिकाओं में विभक्त हो जाती हैं तथा अंत में पतली पतली केशिकाओं में बट जाती हैं। यह छोटी-छोटी केशिकाएं जुड़कर शिराकाएं और फिर शिराएं बनाती है। रुधिर का बहाव सदैव एक ही दिशा में होता है।
पादपों में परिवहन (Transportation in Plant)
उच्च पादपों में जड़ो द्वारा ग्रहण किया गया जल एवं पतियों द्वारा प्रकाश संश्लेषण से उत्पन्न खाद्य पदार्थ पौधों के विशिष्ट ऊतकों द्वारा सभी अंगों तक पहुंचते हैं। पौधों में जल एवं खाद्य पदार्थों का इस प्रकार पहुंचने की प्रक्रिया को परिवहन कहते हैं पादपों में जल तथा खनिज पदार्थों का मृदा से अवशोषण विसरण द्वारा संपन्न होता है तथा इन पदार्थों के आंतरिक परिवहन हेतु संवहन ऊतक पाए जाते हैं। यह संवहन ऊतक जल तथा खनिज लवणों के साथ ही खाद्य पदार्थों का परिवहन भी करते हैं। पादपों में पाए जाने वाले संवहन ऊतक निम्न दो प्रकार के होते हैं।
जाइलम
फ्लोएम
इनमें से जाइलम मृदा से प्राप्त जल एवं खनिज लवणों को जड़ से पादपों के अन्य भागों तक पहुंचाता है, जबकि फ्लोएम पतियों द्वारा बनाए गए खाद्य पदार्थों को पादपों के सभी भागों तक पहुंचाता है।
जल का परिवहन (जल का अवशोषण)
मृदा से जल का परिवहन पादपों की मूल में उपस्थित मूलरोम द्वारा होता है। यह मूलरोम मृदा के कणों के बीच फंसे रहते हैं तथा इन कणों के चारों ओर स्थित जल की पतली परत के संपर्क में रहते हैं। इस जल परत को कोशिका जल कहते हैं। प्रत्येक मूलरोम के मध्य में एक बड़ी धानी होती है। जिसके कोशिका रस में खनिज लवण, शर्कराएं व कार्बनिक अम्ल घुले रहते हैं। इन पदार्थों के घुले होने के फलस्वरुप मूलरोमों के कोशिकाद्रव की सान्द्रता बढ़ जाती है अर्थात कोशिकाद्रव का परासरण दाब मृदा के जल के परासरण दाब से अधिक हो जाता है। अतः जल इस उच्च दाब के कारण अर्धपारगम्य प्लाज्म झिल्ली से होकर मूलरोम के बाहरी कोशिका में प्रवेश कर जाता है।
जड़ में जल का संवहन- जल के मूलरोम में प्रवेश करने पर इसका स्फीति दाब बढ़ जाता है। यह दाब जल को कॉर्टेक्स की कोशिकाओं में पहुंचाता है। जल एकत्रित होने से कॉर्टेक्स की कोशिकाएं पूर्णतः स्फीति हो जाती हैं और इनकी लचीली भित्तियां कोशिकाओं के अंतरद्रव्य पर दबाव डालती हैं। जिससे जल जागरण वाहिका में चला जाता है। इस प्रकार कॉर्टेक्स कोशिकाएं पंप के समान कार्य करके जल को लगातार जाइलम वाहिका में धकेलती रहती हैं। इससे कोशिकाओं में एक प्रकार का दबाव उत्पन्न हो जाता है। जिसके कारण जल तने में ऊपर तक चढ़ जाता है। इस दाब को मूल दाब कहते हैं।
मूल दाब- मूल दाब वह दाब है जो जड़ों की कॉर्टेस कोशिकाओं द्वारा पूर्ण स्फीति अवस्था में उत्पन्न होता है। जिसके फलस्वरुप कोशिकाओं में एकत्रित जल न केवल जाइलम वाहिका में पहुंचता है बल्कि तने में भी ऊंचाई तक चढ़ जाता है।
रसारोहण- पौधों में जनों द्वारा भूमि से अवशोषित जल तथा उसमें घुले खनिज लवणों को जाइलम ऊतक द्वारा तने से होकर पत्तियों तक पहुंचाया जाता है। इस क्रिया को रसारोहण कहते हैं। रसारोहण की खोज डिक्सन व जौली ने की थी।
फ्लोएम द्वारा पादपों में खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण-
पौधे की पत्तियां प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करती हैं। पतियों द्वारा बना भोजन कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़) होता है। पौधे के सभी भागों को भोजन की आवश्यकता होती है। अतः पौधे की पत्तियों में बना भोजन पौधे के सभी भागों जैसे तने, शाखाओं, जड़ आदि में परिवहन तंत्र द्वारा पहुंचाया जाता है। पतियों द्वारा बने भोजन का परिवहन घुलनशील अवस्था में विशेष प्रकार के ऊतक फ्लोएम द्वारा होता है। फ्लोएम की कोशिकाएं सजीव होती हैं। फ्लोएम पौधे के सभी भागों में उपस्थित होता हैै। अतः पतियों से पौधे के अन्य भागों में भोजन के परिवहन को स्थानांतरण कहते हैं।














So amezing
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